₹1 से शुरू हुई क्रांति: सैम पित्रोदा की कहानी
– ओडिशा के एक छोटे से गाँव से निकलकर अमेरिका तक का सफर तय करने वाले सैम पित्रोदा ने आरामदायक जीवन और सफलता हासिल की। लेकिन उनका असली सपना भारत की सेवा करना था।
राजीव गांधी ने जब उन्हें भारत की तकनीकी दिशा बदलने का प्रस्ताव दिया, तो पित्रोदा ने मात्र ₹1 के प्रतीकात्मक वेतन पर काम करने का निर्णय लिया। उन्होंने हाल ही में यूट्यूब चैनल Young Indian in Politics पर श्रेया राजपूत को दिए इंटरव्यू में बताया कि उनके लिए असली इनाम राष्ट्र निर्माण था, धन नहीं।
तकनीक का मानवीय दृष्टिकोण
इंटरव्यू के 38वें मिनट पर उन्होंने कहा कि तकनीक केवल उपकरणों की बात नहीं है, बल्कि यह मानव समस्याओं का समाधान है।
- गाँवों को दूरसंचार से जोड़ना
- बच्चों को टीकाकरण दिलाना
- साक्षरता फैलाना
उनके अनुसार असली क्रांति मानव क्षमता का निर्माण है।
युवाओं पर भरोसा
48 से 52 मिनट के बीच उन्होंने युवाओं को स्थानीय स्तर पर समस्याएँ हल करने की प्रेरणा दी। उनका मानना है कि भारत का भविष्य तभी बदलेगा जब युवा आदेशों का इंतज़ार किए बिना नवाचार करेंगे।
अधूरी राहें और पछतावा
1 घंटे 18 मिनट पर उन्होंने भारत की शुरुआती सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाओं का ज़िक्र किया। प्रोटोटाइप बने, लेकिन बड़े स्तर पर लागू नहीं हो पाए। उनकी आवाज़ में गर्व भी था और अफसोस भी—यह याद दिलाने के लिए कि केवल दृष्टि पर्याप्त नहीं, क्रियान्वयन भी ज़रूरी है।
अगली पीढ़ी के लिए संदेश
इंटरव्यू के अंत में उन्होंने युवाओं से कहा:
“अपने ज़िले की ज़िम्मेदारी लो। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता की समस्याएँ हल करो। अगर पर्याप्त लोग ऐसा करेंगे तो भारत नीतियों से नहीं, बल्कि जनता की इच्छा से बदलेगा।”
सेवा का असली अर्थ
1 घंटे 50 मिनट पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने प्रतीकात्मक वेतन क्यों लिया। अमेरिका में आर्थिक स्थिरता हासिल करने के बाद वे यह दिखाना चाहते थे कि राष्ट्र सेवा का मतलब पैसा नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता है।
साक्षात्कार का लिंक जोड़ा गया
https://youtu.be/V368rlcLowQ?si=RuqTpCk9uYXJYE9o

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